Sunday, January 20, 2019

रोबोटिज्म और आप


आज चारों ओर स्वचालित व्यवस्थाओं का बोलबाला है। मानों हमारी सभ्यता ने कोई नया इज्म; कैपिटलिज्म, कम्यूनिज्म, सोशलिज्म आदि की तर्ज पर रोबोटिज्म प्रस्तावित किया है। जब आप ई-मेल टाइप करते हैं तो उसका साॅफ्टवेयर एक सर्वोचित शब्द आपको सुझाता है। आॅटोमैटिक स्पलिंग चेक, ग्रामर चेक व अनुवाद आदि पहले से कहीं अधिक क्षमता के साथ उपलब्ध हैं। यदि किन्डल पर किताब पढ़ रहे हों और किसी शब्द का अर्थ स्पष्ट न हो तो उस शब्द को जरा सा दबाने पर उसके सारे अर्थ व प्रयोग स्क्रीन पर आजाते हैं। ऐसी अनेक बातों से हम परिचित हैं और यह भी सम्भव है कि इस तरह की बातें अब हमें आश्चर्यचकित  न करती हों। फिर क्या! प्रश्न ये उठता है यदि रोबोटिज्म एक वास्तविकता बन चुका है तो क्या उसके अनुरूप किसी कार्य-संस्कृति के निर्माण की ज़रूरत है? आइये कुछ साधारण सी खबरों पर गौर करें।

आज से लगभग दो दशक पहले जापान में एक छोटी बच्ची की मौत स्कूल के बन्द होते गेट में फंसने से हो गयी थी। उस स्कूल का स्वचालित मेन गेट तय समय पर बन्द होता था और वह बच्ची एक सेकण्ड से भी कम समय की देरी से अन्दर जा रही थी। शायद उस स्कूल की तात्कालिक कार्य-संस्कृति में उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा का समुचित प्रबन्ध नहीं था। हमारे देश  में भोपाल गैस कांड शायद वैसी ही किसी कार्य-संस्कृति में छिपी उपेक्षा का प्रतीक है। हाल ही में छपी एक खबर के अनुसार उसी जापान के किसी होटल में तैनात 300 रोबोटों में से 123 को इसलिये हटा दिया गया क्योंकि क्योंकि वे लक्षित रूप से काम नहीं कर पा रहे थे। क्या यह घटना किसी अन्य प्रकार की कार्य-संस्कृति की ओर इशारा कर रही है?

दूसरी तरफ हमारे देश  की अनेक एयरलाइन्स तनावग्रस्त हैं। किंगफिशर बन्द हो चुकी है। एयर इंडिया को खरीददार नहीं मिल रहे हैं। एक अन्य एयरलाइन के विदेशी निवेशक ने आधे मूल्य पर प्रमोटर के शेयर खरीदने का प्रस्ताव किया है। दशकों से जिन असेट्स को पोषित किया गया आज उनके मोल नहीं लग पा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर हाल में ही उभरे स्टार्टअप्स अपनी उत्कृष्ट कार्य-संस्कृति के चलते बेतहाशा वैल्यूएशन कमांड कर रहे हैं।

सवाल ये है कि एमएसएमई क्या करें? अपनी कार्यशैली को माहौल के अनुरूप बनायें, और क्या! जब दुनिया के सभी प्रकार के उपक्रम; सरकारें, इन्स्टीट्यूशन्स, फौज, पुलिस, उद्योग, व्यापार, सभी के सभी, अपनी कार्य-संस्कृति के पुर्ननिर्माण में लगे हैं तो एमएसएमई इस बात से परहेज़ क्यों करें?

आपके चिन्तन हेतु एक विचार प्रक्रिया यहाँ दी जा रही है। जैसे जापान के उस होटल ने उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रख कर रोबोट्स को हटा दिया क्या उसी तौर पर हम हमारे उद्योग-धन्धों के उपयोगकर्ताओं पर गौर करें। साथ ही साथ कर्मचारियों को भी उपयोगकर्ताओं के रूप में देखने का प्रयास करें। विश्वास है कि आपके द्वारा की गयी एक पहल को आपकी टीम के सदस्य पहचान जायेंगे और आपको जल्द ही उसका सकारात्मक रिसपांस देखने को मिलेगा।

परिवर्तन की उद्यमशीलता


किसी विद्वान की उक्ति के अनुसारः ‘‘है परिवर्तन शील जगत में, शाश्वत केवल परिवर्तन।’’  ऐसे अनेक विचार हम पहले से ही जानते हैं। परन्तु, क्या उद्योग जगत वास्तव में शील है? क्या वह शीलता हम महसूस कर पा रहे हैं? मैनेजमेंट के दिग्गजों ने तो उद्योग जगत को पहले ही वूका” (VUCA) घोषित कर दिया है; जहाँ वह घमासान है जिसमें अवसर अचानक लुप्त हो रहे हैं; अनिश्चितता का राज है; जटिलतायें बढ़ रही हैं; एवं चारों ओर धुंध है। पर शायद सुरंग के छोर पर रोशनी भी है; यही हम सबका यकीन है। साथ ही, आगे का मार्ग आगे बढ़ने पर ही दिखेगा; यह भी आज की एक और हकीकत है।

कृपया ध्यान दें, हो सकता है, स्वच्छता को लेकर हुए हमारी सोच के परिवर्तन कोई ऐसी बात भी छुपी हो जो सबके लिये उपयोगी साबित हो। इस घटनाक्रम में नागरिकों की सोच स्वच्छता के अलावा दूसरे मुद्दों पर भी बदलती दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे इस सकारात्मक परिवर्तन ने दूसरे सकारात्मक परिवर्तनों को रास्ता खोल दिया हो। स्वच्छता के इस यज्ञ में, कर्मचारियों का सहयोग व त्याग; साधनों की उपलब्धिता के अलावा कम्यूनिकेशन ने एक बड़ी भूमिका अदा की है। दीवालों पर लिखे सन्देशों के साथ-साथ कचरा गाड़ियों पर बजने वाले गीतों ने उन विचारों को जन-जन के मानस पटल पर अंकित कर दिया है। अचेतन में पैठ कर चुके ये विचार उनके परिवर्तित व्यवहार में प्रदर्शित हो रहे हैं। हम सभी इस विशाल परिवर्तन के सहभागी होने के साथ इससे लाभान्वित भी हैं।

तो क्या यह ठीक न होगा कि हमारे उद्योगों के कर्ताप्रमुख परिवर्तन की उद्यमशीलता के एक कदम स्वरूप अपने उद्योगों के आन्तरिक संवाद को बदल कर उसके असर का लाभ उठायें! इस प्रक्रिया में आन्तरिक संवाद की अन्य युक्तियों के अलावा फोकस ग्रुप्स, क्वालिटी सर्कल्स या फिर टाउन हाॅल जैसी युक्ति से उभरी सामुहिक गतिविधियाँ विशेष रूप से उपयोगी साबित होंगी।

Friday, November 16, 2018

उद्योग चर्चा-06 उद्यमिता और भाग-दौड़

एक मशहूर अफ्रीकी कहावत कुछ इस प्रकार है- 

दर सुबह हर जंगल में एक बारह सिंघा भागे,
वह जाने मौत से बचने को वो शेर से तेज ही भागे; 
हर सुबह उस जंगल में इक बब्बर शेर भी जागे,
वह जाने भूख से बचने को वो सिंघे से तेज ही भागे;
फर्क नहीं तुम क्या हो - बब्बर शेर या बारह सिंघा, 
कर्म तुम्हारा दौड़ ही है, ज्यों ही सूरज जागे!

क्या आपको इस कहावत में कोई सन्देश - किसी रेस का फास्ट ट्रैक - नज़र आ रहा है। अक्सर एमएसएमई पर फब्ती कसी जाती है कि वे किसी ट्रेडर की सोच में ही अटके हुए हैं। आखिर एक ट्रेडर के पास गौर करने के लिये स्वयं का समय, मार्जिन और पूँजी का प्रयोग ही तो है न! वह इनको न देखे तो क्या देखे। फिर एमएसएमई फास्ट ट्रैक की खोज में किस ओर देखें! इस बारे में कुछ कारोबारियों का उल्लेख सबके लिये विचारणीय है। 

सबसे पहले राणेग्रुप जिन्हें हाल ही में 2018 के डेमिंग पुरस्कार से नवाज़ा गया है। यह पुरस्कार किसी कम्पनी को विश्व में उस वर्ष की सर्वोत्तम उत्पादन क्वालिटी प्रक्रिया के लिये दिया जाता है। उद्योगों को इस ग्रुप की गुणवत्ता यात्रा पर सामूहिक विचार करने पर बहुत सी काम की युक्तियाँ मिलेंगी। इसके अलावा फ्लिपकार्ट और स्विगी भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कई प्राइवेट फंड तथा संस्थागत निवेशकों ने इन कम्पनियों में भागीदारी लेकर इन्हें तलवार की धार पर चलने में मदद की और इस प्रकार बेशुमार वेल्थ जनरेशन किया। 

ग्राहकों के समक्ष इन कम्पनियों के प्रस्तावों में कोई भी ऐसी चीज़ नहीं है जिसका प्रचलन पहले से न था। उस प्रकार के उत्पादन या सेवा प्रक्रियाऐं किसी न किसी रूप में चल रही थीं। इन कम्पनियों ने उन प्रक्रियाओं का पुर्नयोजन कुछ इस प्रकार किया कि वे ग्राहकों, कर्मचारियों और वेण्डर्स के लिये आकर्षक बन गयीं। अवश्य ही कारोबार के विभिन्न प्रतिभागियों के बीच अभूतपूर्व सहयोग स्थापित करने से ही ऐसा संभव हुआ होगा। तभी तो बिलकुल साधारण प्रतीत होने वाली सेवायें और आसानी से उपलब्ध वस्तुऐं और उनके वेण्डर्स; सभी किसी आला मशीन के जैसे काम कर रहे है। खास बात यह है कि इन सभी ने किसी दिन अपनी दौड़ का आंकलन कर फास्ट ट्रैक की पहचान की होगी। इस काम के लिये उन्होंने प्रतिष्ठान के अन्दर झांका होगा - कर्मचारियों के साथ विचार- विमर्श किया होगा। तब जाकर उन्हें अपने कारोबार के उन अनछुए पहलुओं का पता चला होगा जिनके इस्तेमाल से ये कारोबार इतनी तरक्की कर सके। 

कहीं आपके कारोबार, आपके उद्योग या आपकी उत्पादन प्रक्रिया में भी कोई ऐसे अनछुए पहलू तो नहीं छुपे हैं जिनके इस्तमाल से बेतहाशा तरक्की हो जाय; और आने वाले समय में आपके समकालीन एमएसएमई, आपके कर्मचारी, आपके पड़ौसी सभी अचरज करें कि जैसा कभी सोचा न था वैसा इन्होंने कर दिखाया। 

उद्योग चर्चा - 05 कार्यकुशलता

कार्यकुशलता के किस्से असंख्य हैं - जितने प्रशंसक उतनी कहानियाँ। प्रशंसा से प्रेरित आँखे उन पात्रों और उनके किस्सों को पहचान ही लेती हैं। अपने उद्योग में कार्यकुशलता की पहचान करना उद्यमियों को आता है, फिर भी इससे सम्बन्धित बातें आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं।

कारीगर और कार्यकुशलता का अटूट नाता है। ऐसे अपुष्ट किस्से भी सुनने को मिलते हैं जिनके अनुसार किसी स्मारक विशेष के बन जाने के बाद अमुक राजा ने कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे। ताकि वैसा स्मारक दोबारा न बन सके। किन्तु उससे क्या मूर्तिकला रूक गयी, नहीं! दरअसल कार्यकुशलता किसी प्रचार साधन की मोहताज नहीं होती। वह तो कुशलताके साधकों की प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर देती है; और अचंभित करने वाले नतीजे तैयार कर देती है। ऐसी ही पाँच पीढ़ियों की एक सत्यकथा आपकी जानकारी के लिये दी जा रही है।

एक गुजराती भाई बम्बई की कपड़ा मिल में रूई की पहचान व छंटाई में कार्यकुशल थे। इस बात की बदौलत वे एक नाॅलेज-वर्कर थे। उनके बेटे को वैसे ही गुण मिले और उन्होंने घड़ी की मरम्मत का काम सीखा और अपने हुनर से अहमदाबाद के प्रमुख घड़ीसाज कस्तूरेजी को भी चकित कर दिया। उसके बाद इन्दौर आने पर अपनी कार्यकुशलता के दम पर वाचरिपेयरिंग की दुकान चलाकर सफल जीवन यापन किया। तीसरी पीढ़ी के सज्जन ने घड़ी के पुरजों की दुकान चला कर जीवन को सफल किया। चौथी पीढ़ी में इन सज्जन के तीन बेटों में से दो जहाँ मशीनी पुरजों के व्यवसाय में अलग-अलग कार्यरत हैं तो तीसरे दवाओं के व्यवसाय में हैं। इस पीढ़ी में आज भरपूर सम्पन्नता दिखाई पड़ती है। पाँचवीं पीढ़ी तैयार हो रही है। कुछ बच्चे आईआईटी जैसी शिक्षा प्राप्त कर उत्कृष्ट जाॅब में हैं तो अन्य उसी तरह से शिक्षा ले रहे हैं। इस परिवार के पितृ पुरूष ने कपड़ा मिल के श्रमिकों के साथ काम करते हुए कार्यकुशलता का पाठ सीख कर अनायास ही आने वाली पीढ़ियों की सम्पन्नता की नींव डाल दी।

भारत के परंपरागत फूडप्रोसेसिंग के उद्योगों के कुशल कार्यकर्ता आज सभी प्रमुख शहरों में पहुँच कर मूल नाम के उत्पादों को वहीं बना कर सप्लाय कर रहे हैं। आन्ध्र प्रदेश से तमिलनाडु गये रूई के खेतिहर मजदूरों ने तिरूपुर में कपड़ा उद्योगों की स्थापना कर निर्यात के कीर्तिमान स्थापित किये हैं। निश्चय ही ऐसी सफलता की कहानियों के नायकों को अपने मूल उद्योग स्थल पर प्रशंसा मिली होगी और उनकी कार्यकुशलता को पहचाना गया होगा। इसके साथ ही उनकी कार्यकुशलता से प्राप्त उत्पादकता का भरपूर लाभ उनके मूल उद्योगों को अवश्य ही मिला होगा।

उद्योग चर्चा - 04 नेक्स्ट लेवल

अधिकांश उद्योगपति कभी-न-कभी अपने उद्योग की अगली पायदान या ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ के बार में सोचते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे भी होंगे जो काम में इतने व्यस्त कि इस बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती और नेक्स्ट लेवल वैसे ही आजाता है। ऐसे भी उद्योग होंगे जिन्हें अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ रहा हो और ऐसे में किसी भी प्रकार के डेवलेपमेंट का विचार मात्र भी अनुपयोगी प्रतीत होता हो। फिर भी ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ की सर्वव्यापक उपयोगिता को एकदम नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता है। गवर्नमेंट सप्लाई, जान-पहचान, पुराने रिश्ते, बड़े उद्योगों की छत्र-छाया और अनेक ऐसे कारण हैं जो कई उद्योगों के अटल अस्तित्व की वजह बने हैं। इसके विपरीत कई नये उद्योगों ने मार्केट को साध कर भी स्वयं को खड़ा कर लिया है। कुछ उद्योगों ने पुराने उत्पादों से बेरूखी कर एकदम नये प्रकार के उत्पादों को लेकर नेक्स्ट लेवल की खोज में निकल पड़े हैं। नेक्स्ट लेवल तक ले जाने वाली सीढ़ी न तो स्पष्ट दीख पड़ती है और न ही उसकी कोई डिझाइन बाज़ार में तैयार मिलती है। परन्तु नेक्स्ट लेवल में गज़ब का आकर्षण है; अतः उसके लिये समुचित प्रयास हो इस बाबद कुछ बातें आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं।

स्पेयर कैपेसिटी का उपयोग- अधिकांश उद्योगों की स्थापना के समय ही अतिरिक्त क्षमता का प्रवधान रखा जाता है। उद्योग संघ अपने सदस्यों में से एक छोटा समूह बना कर आवश्यक जानकारियों के आदान-प्रदान की व्यवस्था कर सकते हैं। स्पेयर कैपेसिटी के उपयोग से अर्जित धन उत्पादों की कीमत कम करने में काम आ सकता है।

आउट आॅफ बाक्स थिंकिंग- एक नगर में किसी गीयर फैक्ट्री में दर्जनों मशीनें चालू हालत में बन्द रखीं हैं। सारी व्यवस्थायें ठीक हैं परन्तु काम बन्द है। कारण, कोई आॅटोमोबाइल कम्पनी गीयर्स ऐसे भाव में बेच रही है जितने में यह कम्पनी गीयर बनाने के लिये स्टील खरीदती है। ऐसे में यह कम्पनी जिसके कर्मचारी घर बैठे हैं यदि कुछ कर्मचारियों को उन मशीनों पर मनचाहा जाॅबवर्क लाकर करने की छूट दे सके तो उससे होने वाली आय से वह कम्पनी अपने गीयर्स की कीमत सब्सिडाइज़ कर मार्केट में एक बार फिर खड़े होकर अगली प्लानिंग कर सकती है।

कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग- कुछ उद्योग जिनके पास उचित तकनीकी क्षमता है वे मार्केट लीडर्स के लिये उनके डिझाइन के अनुसार उत्पादन करें। इसके लिये भी उद्योग संघ अपने सदस्यों में से एक छोटा समूह बना कर बड़े उद्योगों या विदेशों में स्थित उद्योगों को यहाँ उपलब्ध क्षमताओं का दोहन करने के लिये आमंत्रित कर सकते हैं।

ह्यूमन रिसोर्स लीवरेजिंग- उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों में निहित क्षमताओं का विस्तार कर उन्हें काम के जरिये अधिक सन्तोष व आमदनी के लिये प्रेरित कर उद्योग नेक्स्ट लेवल तक जा सकते हैं। उद्योग की सूक्ष्मताओं से परिचित ऐसे कर्मचारी बड़ी आसानी से ग्राहकों से डील कर सकते हैं। उन्हें विक्रयकला का प्रशिक्षण देकर उद्योग के प्रतिनिधित्व के लिये तैयार किया जा सकता है।

जीएसटी द्वारा विस्तारित मार्केट का दोहन- जीएसटी ने देश के अन्य कई भागों को आपके लिये सम्भावित मार्केट के रूप में खोल दिया है। मार्केटिंग टीम को प्रोफेशनल व और अधिक सक्षम बना कर दूर-दराज के बाज़ारों को अपने उद्योग से जोड़ने के अवसरों का लाभ उठायें।

विश्व व्यापार व चीन-अमेरिका संघर्ष- चीन व अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर संघर्ष उभर चुका है। यदि निकट भविष्य में उनके बीच कोई समझौता भी हो जाता है तो भी उनके बीच पड़ चुकी दरार ही दूसरे देशों के लिये अवसर का काम करेगी। 1970 के दशक में ऐसा ही गतिरोध जापान व अमेरिका के बीच उभर कर आया था। उस समय चीन समेत अन्य एशियाई देशों द्वारा किये प्रयास कालान्तर में उनके लिये लाभप्रद साबित हुए थे। ऐसी सूरत में भी उद्योग संघ के नेतृत्व में समान उद्योग अपने मार्केट का अन्य देशों में विस्तार करके लाभान्वित हो सकते हैं। ऐसे प्रयास हमारे देश में चल रहे हैं। इस बारे में कम्बल उद्योग द्वारा सोनीपत में किये सामूहिक व सफल प्रयास विशेष तौर पर अनुकरणीय हैं।

आशा है आपके उद्योग संघ में भी इस प्रकार की युक्तियों को लेकर आम चर्चा हो सकेगी जिसके फलस्वरूप कई उद्योग अपना नेक्स्ट लेवल पा लेंगे। 

उद्योग चर्चा - 03 - समय - सहयोग - सफलता

तीन शब्द, समय, सहयोग और सफलता, जड़ के स्तर पर आपस में जुड़े हैं - बाहर से देखने पर ये जुड़ाव नज़र नहीं आता मगर सफलता तक पहुँचने पर इस जुड़ाव को महसूस किया जा सकता है। सही समय पर सहयोग मिल जाय तो सफलता आसान हो जाती है। सही समय की पहचान के लिये समय के साथ दोस्ती का रिश्ता कायम करना आवश्यक है।

प्रत्येक सभ्यता के प्रचलित ज्ञान में समय के महत्व के दर्शन होते हैं। हमारे देश के अग्रणी शासकों में से एक, राजा भोज की नगरी धार में पहाड़ी पर स्थित मंदिर में लगभग 18 इंच की पीतल से बनी एक तोप आज भी रखी है। मंदिर में तोप का क्या काम? फिर इतनी छोटी तोप से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है? पूछने पर मालूम हुआ कि इस तोप से हर प्रहर समय सूचक गोले दागे जाते थे; और तोप का नाम है, लक्ष्मी-तोप! मानों समय लक्ष्मी का प्रतीक है और उसके गुज़रने की सूचना देकर नागरिकों को समय के इस्तेमाल में जिम्मेदार बनाने की व्यवस्था का अंग थी वह तोप। वैसे तो साधारणतया सभी उद्यमी समय के मूल्य को अच्छे से जानते हैं और उनमें से जो स्वयं के समय के साथ-साथ दूसरों के समय की भी उतनी ही कदर करते है, देखा गया है कि वैसे उद्यमी अपेक्षाकृत ज्यादा सफल रहते हैं।

सहयोग भाव तो सर्वकालिक महत्वपूर्ण भाव रहा है। आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक वैल्थ आॅफ नेशन्स में उद्योगों की जानकारी के लिये किये एक अध्ययन को वर्णित किया है। एक ‘आलपिन’ का उत्पादन करने वाली इकाई में किये इस अध्ययन के जरिये उन्होंने श्रम के विभाजन को उत्पादकता के लिये आवश्यक सिध्द किया। पहले उस इकाई का प्रत्येक मजदूर पूरी-की-पूरी आलपिन स्वयं बना कर पैकिंग के लिये देता था। उसके बाद हर एक मजदूर को उस उत्पादन प्रक्रिया का छोटा सा भाग संपादित करना होता। दूसरी तरह से वह इकाई बहुत अधिक आलपिनों का उत्पादन कर सकी। उनके इस प्रयोग से कुछ शताब्दि पूर्व जब हमारा देश  विश्वव्यापार में अग्रणी था तब यहाँ का कपड़ा उद्योग अपनी महानता के लिये विश्वविख्यात था। आपने भी ढ़ाका की मलमल जैसी अनेक किवदन्तियाँ सुन रखी होंगी। अब अगर एक साड़ी बिना दिक्कत किसी अँगूठी में से निकल सके तो उस प्रकार का उत्पादन क्या कोई एक मनुष्य अपने आप अकेले ही कर सकता होगा? अवश्य ही कोई उत्कृष्ट व्यवस्था कई मनुष्यों और समूहों के सहयोग के फलस्वरूप ऐसे उत्पादन को अंजाम तक पहुँचा पाती होगी। उस व्यवस्था अथवा संघ के उद्देश्य किसने निर्धारित किये होंगे? क्या कोई एक व्यक्ति ऐसा करने में समर्थ हो सकता है; या फिर कई लोगों के प्रयासों और उन प्रयासों के फलों का अध्ययन करने पर ऐसा हो सका होगा।

क्या उस प्रकार का सहयोग भाव आज के व्यापारिक तथा औद्योगिक संघों के लिये उपयोगी होगा? क्या उद्योगों के आन्तरिक सहयोग समूहों की तर्ज पर उद्योगों के बीच सहयोग भाव को किसी ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ तक ले जाने की जरूरत जान पड़ती है? यदि वैसा है तो उस ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ का ‘‘एजेण्डा’’ क्या हो? और यदि भारतीय उद्योगों को दुनिया ‘‘विश्व की फैक्ट्री’’ के रूप में देख सके तो वे उद्योग कैसे हों, यह प्रश्न आपके विचारार्थ प्रस्तुत है!

उद्योग-चर्चा 02 - ज्ञान व आचरण

आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रदत्त साधन इतने जबरदस्त हैं कि मनुष्यों के लिये उपयोगी ज्ञान को कुछ ही देर में सारे विश्व में फैलाया जा सकता है। संचार के साधनों में हुई प्रगति की बदौलत ईमेल, विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया, इंटरनेट के वेबसाइट व ब्लाग्स और कई तरीके इसमें मददगार हैं। प्रतिदिन हमारे फोन पर या अखबारों या पत्र-पत्रिकाओं में चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास, उद्यमशीलता आदि के ज्ञान की न जाने कितनी जानकारियाँ उपलब्ध हैं। लगता है ऐसी सामग्री की बाढ़ सी आई हुई है। कभी-कभी तो ऐसा भी महसूस होता है कि लोग विज्ञापनों की तरह इन बातों से भी बेरूखी न कर लें। इसके पहले कि ऐसा हो, कुछ बातें आपके विचारार्थ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

पिछले कुछ वर्षों में इस लेखक को सेल्फ मैनेजमेंट की कई पुस्तकों का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करने के अवसर मिले। एक अमेरिकन मोटिवेशनल स्पीकर डैन लीयर की लिखी ऐसी ही एक पुस्तक से चन्द वाक्य यहाँ उदृत हैं- 

‘‘एक दशक से भी अधिक समय से मैं प्रोफेशनल स्पीकिंग की ट्रेनिंग व कोचिंग कर रहा हूँ। कई लोग इन सेमीनार्स के साथ सीडी और टेप इसलिये खरीदते हैं कि वे अपने जीवन में एवं बिज़नेस में उन जानकारियों पर आचरण करना चाहते हैं। उनकी सर्वोत्तम मंशा के बावजूद हमारी रिसर्च यह कहती है कि 7 से 13 प्रतिशत लोग उस पैकेज को खोलते तक नहीं; और 55 प्रतिशत व्यक्ति तो कभी भी उस टेप या सीडी को पूरा नहीं सुनते।’’ 

क्या आप जानते हैं कि इस प्रकार का आचरण अमेरिका तक सीमित न होते हुए दूसरे कई देशों में फैला हुआ है। तभी तो भारत में इस जैसे आचरण पर कटाक्ष-स्वरूप कई उक्तियाँ प्रचलित हैं। उदाहरण के लिये मराठी भाषा की उक्ति- ‘‘कळत पण वळत नाहीं’’ को ले लें - मतलब, ‘जानता है मगर करता नहीं’। मैंने स्वयं अपने एक सेमीनार में इस बात का जिक्र कर मराठी भाषा की यह उक्ति बतायी ही थी कि एक राजस्थानी महिला बोल पड़ी, ‘‘हमारे यहाँ भी कहावत है- ‘भणयो पर गुणयो नहीं’ और उसका मतलब भी ऐसा ही है।’’ इतने में एक गुजराती महिला ने कह दिया, ‘‘हमारे गुजरात में भी ऐसा ही है, ‘भणयो पण गणयो नथी’ - वो ही अर्थ है।’’ इन सब उक्तियों के अर्थ में थोड़ा-थोड़ा फर्क हो सकता है। संभव है कि भारत के दूसरी भाषाओं में भी इससे मिलती जुलती उक्तियाँ अथवा कहावतें प्रचलित हों। 

मुद्दा यह है कि हर भाषा में ज्ञान के उपयोग पर बल दिया गया है और जब ज्ञान के समुचित उपयोग में कोई कसर रह जाती है तो ऐसी ही उक्तियाँ या कहावतें हमें ऐड़ लगाने का काम करती हैं। आप अवश्य जानते होंगे कि उपयोगी ज्ञान को समयबध्द आचरण में परिवर्तित करना उद्यमियों का आवश्यक गुण है। अब अन्त में एक और बात आपके विचारार्थ- 

खयाल जब कोई आ जाय पसन्द, कीजिये फौरन उसे मुट्ठी में बन्द;

वरना वो खयाल आज यहाँ तो कल जाने कहाँ होगा;

तभी तो कहते हैं लोग, होगा वही जो मन्ज़ूरे ख़ुदा होगा।