विक्रयकला की शैलियाँ - 01
आलू-प्याज़ और
विक्रयकला
हर सेल्समैन का सपना रहता है कि उसकी वस्तुओं
का विक्रय आलू-प्याज़ की तरह फटाफट हो - जैसे ही ग्राहक की नज़र उस पर पड़े, वे
अपना ऑडर्र लिखाना शुरू कर दें। आप जानते ही हैं कि
आलू-प्याज़ इसलिये फटाफट बिक जाते हैं क्योंकि इनका उपयोग बहुत व्यापक तौर पर किया
जाता है और रसोई के कई व्यंजनों एवं सलाद में तो प्याज़ का प्रयोग अत्यंत आवश्यक माना
गया है। अब हर वस्तु में ऐसा उपयोग-जनित आकर्षण कहाँ रहता है। फिर भी कोई ध्येय
बनाना हो तो यह विचार ठीक ही है।
आइये आलू-प्याज़ या कहें कांदे-बटाटे के विक्रय
से कुछ और जानने का प्रयास करते हैं। इनके विक्रय की शैली की खास बात यह है कि
ग्राहक इन्हें देख व छू कर अपनी समझ के अनुसार छांट लेते हैं। देखा जाय तो
ग्राहकों को ऐसी आज़ादी पसन्द है। इसलिये ऐसी वस्तुऐं अक्सर पैकिंग में नहीं बेची
जाती हैं। मॉल्स में एक और सहूलियत है कि ग्राहक बड़ी आसानी से कम मात्रा जैसे कि 75
ग्राम या 135 ग्राम सब्ज़ी या कोई अन्य छोटी या बड़ी मात्रा
में उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद कर सकते हैं। यह आज़ादी भी ग्राहकों को पसंद है।
अब आप जिस वस्तु का विक्रय कर रहे हैं क्या उसे
खरीदने में आपके ग्राहक आलू-प्याज़ सरीखी आज़ादी महसूस कर पाते हैं? ज़रूरी
नहीं! संभव है वहाँ पर आपके प्रतिस्पर्धियों की उपस्थिति कुछ आज़ादी का एहसास
ग्राहकों अवश्य को देती होगी। फिर भी आलू-प्याज़ जैसी आज़ादी अन्य वस्तुओं के विक्रय
में नज़र नहीं आती है। जहाँ गारमेंट का सेल लगता है या फिर एक ही शेड के नीचे 50
हज़ार वस्तुओं का सेल रहता है; वहाँ उस आज़ादी के दर्शन अवश्य होते
हैं।
यदि आप पैकेज्ड उपभोक्ता वस्तुओं का विक्रय
करते हैं तो वहाँ पैकिंग पर अंकित ब्रांड काफी हद तक ग्राहकों को वस्तुओं को परख
कर खरीदने के श्रम से अवश्य मुक्त कर देती है। दूकानों पर अन्य ब्रांडों की उपस्थिति
ग्राहकों को चुनाव की आज़ादी का एहसास अवश्य देती है; फिर भी
आलू-प्याज़ के खरीद सी आज़ादी कहाँ!
यदि आप औद्योगिक सामान का विक्रय कर रहे हैं तो
चुनाव की यह आज़ादी उपयोग कर्ता की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। दरअसल ये परिस्थितियाँ
उस आज़ादी को बहुत कुछ सीमित कर देती हैं। चुनाव के अवसर अवश्य रहते हैं किन्तु
वस्तुओं के गुण, विशेषताऐं व उनके प्रयोग की सीमाऐं चुनाव के
मापदंड बन जाते हैं।
औद्योगिक वस्तुओं व उपभोक्ता वस्तुओं का यही
फर्क सेल्समैन के काम की शैली का निर्धारण करता है। उपभोक्ता वस्तुओं का ग्राहक
अक्सर दुकानों या ठेलों या खुले बाज़ारों में जाकर अपनी खरीदारी करता है। ग्राहक का
विक्रेता तक पहुंचना ही उसकी आवश्यकताओं का इशारा बन जाता है। अब विक्रेता को उस आवश्यकता
को समझ कर सुझाव देने का काम बाकी रहता है। इसमें दूकानदार को साफ तौर पर यह मालूम
रहता है कि ग्राहक पहले ही अपनी उर्जा व समय लगा चुका है, और वह आसानी से
वापस जाने के लिये नहीं आया है।
इसके ठीक विपरीत औद्योगिक वस्तुओं के सेल्समैन
को ग्राहक के स्थान पर जाकर यह पता लगाना रहता है कि वहाँ उसके माल की ज़रूरत है या
नहीं। अब भला कोई खरीदार किसी भी सेल्समैन से ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी क्यों साझा
करे! ज़ाहिर सी बात है कि प्रत्येक सेल्समैन को इस प्रश्न का जवाब अपनी तैयारी में
खोजना रहता है। फिर आवश्यकता मालूम होने पर भी अपनी वस्तु उसे पूरा कर सकेगी वैसा सिध्द करना रहता
है; साथ ही वह वस्तु कितने समय में उपलब्ध हो सकती है वह समयावधि ग्राहक
के लिये अनुकूल होना चहिये; और अन्तिम पड़ाव तो उस वस्तु की कीमत का
होता है। यह क्रम कोई शिलालेख नहीं है - इसमें बदलाव होते रहते हैं, पर
इन मुद्दों का तो हमेशा
सामना होता है।
अब जरा गौर कीजिये, एक सामाजिक
प्राणी की तरह मनुष्यों का दूकानदारों से गहरा संबंध रहता है, और
दो या तीन वर्ष की आयु से हम सभी दूकानदारों के सम्पर्क में आने के साथ ही उनकी कार्यशैली
के अध्ययन में लगे रहते हैं। अनजाने में चल रहे इस अध्ययन की वजह से अक्सर
सेल्समैन दूकानदारों की कार्यशैली को अपना कर वैसे ही काम करते रहते हैं। अब ऐसे
काम में जहाँ ग्राहकों से वार्ता हेतु प्रतिनिधि बन कर उनके स्थान पर जाना रहता है,
उसमें
उचित शैली का प्रयोग न कर पाने के कारण सेल्समैन को लम्बे समय तक अपेक्षित परिणाम
नहीं मिल पाते हैं; और उचित कार्यशैली कई वर्षों का अनुभव होने पर
भी उनकी पहुँच से दूर ही रहती है।
प्रतिनिधि की तरह काम करने के तौर-तरीके किसी
ऐसे व्यक्ति के मार्गदर्शन में सीखे जा सकते हैं जिसने स्वयं इस प्रकार की
विक्रयकला की युक्तियों को सीखा है तथा उनके प्रयोग में सिध्दहस्त है। जो व्यक्ति
विक्रय-प्रतिनिधि की युक्तियाँ सीख कर अवसरों के अनुसार उनका प्रयोग कर पाते हैं,
उन्हें
अपना काम आलू-प्याज की बिक्री की तरह आसान व फटाफट होने वाला काम नज़र आता है और
ऐसे लोग ही अपने काम के साथ न्याय करते हुए तरक्की पाते हैं। यदि आप वैसे किसी
व्यक्ति से सम्पर्क कर अपने करियर को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं तो लेखक से अवश्य सम्पर्क करें।

