Friday, November 16, 2018

उद्योग-चर्चा 02 - ज्ञान व आचरण

आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रदत्त साधन इतने जबरदस्त हैं कि मनुष्यों के लिये उपयोगी ज्ञान को कुछ ही देर में सारे विश्व में फैलाया जा सकता है। संचार के साधनों में हुई प्रगति की बदौलत ईमेल, विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया, इंटरनेट के वेबसाइट व ब्लाग्स और कई तरीके इसमें मददगार हैं। प्रतिदिन हमारे फोन पर या अखबारों या पत्र-पत्रिकाओं में चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास, उद्यमशीलता आदि के ज्ञान की न जाने कितनी जानकारियाँ उपलब्ध हैं। लगता है ऐसी सामग्री की बाढ़ सी आई हुई है। कभी-कभी तो ऐसा भी महसूस होता है कि लोग विज्ञापनों की तरह इन बातों से भी बेरूखी न कर लें। इसके पहले कि ऐसा हो, कुछ बातें आपके विचारार्थ यहाँ प्रस्तुत हैं। 

पिछले कुछ वर्षों में इस लेखक को सेल्फ मैनेजमेंट की कई पुस्तकों का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करने के अवसर मिले। एक अमेरिकन मोटिवेशनल स्पीकर डैन लीयर की लिखी ऐसी ही एक पुस्तक से चन्द वाक्य यहाँ उदृत हैं- 

‘‘एक दशक से भी अधिक समय से मैं प्रोफेशनल स्पीकिंग की ट्रेनिंग व कोचिंग कर रहा हूँ। कई लोग इन सेमीनार्स के साथ सीडी और टेप इसलिये खरीदते हैं कि वे अपने जीवन में एवं बिज़नेस में उन जानकारियों पर आचरण करना चाहते हैं। उनकी सर्वोत्तम मंशा के बावजूद हमारी रिसर्च यह कहती है कि 7 से 13 प्रतिशत लोग उस पैकेज को खोलते तक नहीं; और 55 प्रतिशत व्यक्ति तो कभी भी उस टेप या सीडी को पूरा नहीं सुनते।’’ 

क्या आप जानते हैं कि इस प्रकार का आचरण अमेरिका तक सीमित न होते हुए दूसरे कई देशों में फैला हुआ है। तभी तो भारत में इस जैसे आचरण पर कटाक्ष-स्वरूप कई उक्तियाँ प्रचलित हैं। उदाहरण के लिये मराठी भाषा की उक्ति- ‘‘कळत पण वळत नाहीं’’ को ले लें - मतलब, ‘जानता है मगर करता नहीं’। मैंने स्वयं अपने एक सेमीनार में इस बात का जिक्र कर मराठी भाषा की यह उक्ति बतायी ही थी कि एक राजस्थानी महिला बोल पड़ी, ‘‘हमारे यहाँ भी कहावत है- ‘भणयो पर गुणयो नहीं’ और उसका मतलब भी ऐसा ही है।’’ इतने में एक गुजराती महिला ने कह दिया, ‘‘हमारे गुजरात में भी ऐसा ही है, ‘भणयो पण गणयो नथी’ - वो ही अर्थ है।’’ इन सब उक्तियों के अर्थ में थोड़ा-थोड़ा फर्क हो सकता है। संभव है कि भारत के दूसरी भाषाओं में भी इससे मिलती जुलती उक्तियाँ अथवा कहावतें प्रचलित हों। 

मुद्दा यह है कि हर भाषा में ज्ञान के उपयोग पर बल दिया गया है और जब ज्ञान के समुचित उपयोग में कोई कसर रह जाती है तो ऐसी ही उक्तियाँ या कहावतें हमें ऐड़ लगाने का काम करती हैं। आप अवश्य जानते होंगे कि उपयोगी ज्ञान को समयबध्द आचरण में परिवर्तित करना उद्यमियों का आवश्यक गुण है। अब अन्त में एक और बात आपके विचारार्थ- 

खयाल जब कोई आ जाय पसन्द, कीजिये फौरन उसे मुट्ठी में बन्द;

वरना वो खयाल आज यहाँ तो कल जाने कहाँ होगा;

तभी तो कहते हैं लोग, होगा वही जो मन्ज़ूरे ख़ुदा होगा। 


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