प्रोफेश्नलिज़्म का मानवीयकरण - 2
इस बार समाचारों
द्वारा ट्रिगर मिला और ये विचार आपकी समीक्षा के लिये प्रस्तुत हैं-
भारत के मशहूर कारोबारी आनन्द महिन्द्रा ने सोशल मीडिया में
व्यक्तिगत तौर पर माफी मांग कर अपने ग्रुप की कम्पनी टेक महिन्द्रा से निकाले जा
रहे लोगों के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया
है। जहाँ एक ओर इसे कार्यस्थल पर हो रही मनमानियों पर सोशल मीडिया के एक्टिविज़्म
की विजय के रूप में दर्शाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वयं आनन्द महिन्द्रा ने अपने ग्रुप कम्पनियों की कोर वैल्यू,
कर्मचारियों के व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा पर
बल देते हुए आगे से ऐसा न करने का आश्वासन दिया है।
सर्वविदित है कि किसी भी
कम्पनी को प्रचलित प्रोफेश्नलिज़्म के तहत अपने कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता अनुसार
घटाने-बढ़ाने का अधिकार है। फिर एक प्रोफेश्नली मैनेज्ड कम्पनी को प्रमुख आनन्द
महिन्द्रा को सार्वजनिक तौर पर क्षमा याचना क्यों करनी पड़ी? क्योंकि कुछ सीनियर मैनेजर्स को कम्पनी की कोर वैल्यू- कर्मचारियों
के व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा के अनुरूप काम करने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई। इस कोर
वैल्यू की उपेक्षा के प्रकरण में कम्पनी की ब्रैंडवैल्यू पर विपरीत असर पड़ने के डर
से सार्वजनिक स्तर पर आनन्द महिन्द्रा ने उपरोक्त कदम उठाया।
जरा सोचिये,
यह प्रकरण किस ओर इशारा कर रहा है। कम्पनी
द्वारा मान्य व विज्ञापित कोर वैल्यू में आपको मानवता की झलक देखने को मिलती है या
नहीं? फिर स्वीकृत पाॅलिसी के
अनुसार काम न कर वहाँ के अफसरों ने कम्पनी की ब्रैंडवैल्यू के लिये खतरा पैदा कर
दिया। हो सकता है कि कुछ अफसर वैसा न करना चाहते हों और उन पर कैसे भी इस काम को
निपटाने के दबाव हो या यह सिर्फ एक भूल हो - असलियत हम कभी भी न जान पायेंगे।
किन्तु यह प्रकरण
प्रोफेश्नलिज़्म के प्रचलित स्वरूप के मानवीयकरण की आवश्यकता की ओर हमारा ध्यान
आकर्षित करने के लिये पर्याप्त है। इससे हम यह निष्कर्ष तो अवश्य ही निकाल सकते
हैं कि जहाँ पर प्रचलित प्रोफेश्नलिज़्म में मानवता स्पष्ट रूप से दिखायी देती है
उस कम्पनी की ब्रैंडवैल्यू हमेशा बढ़ती रहेगी।
फिर वह ब्रैंडवैल्यू का प्रयोग योग्य कर्मचारियों को आर्कषित करने में हो
या ग्राहकों को रिझाने में; क्या किसी भी
प्रतिष्ठान को अपनी कार्यसंस्कृति में मानवता को नज़र में रखते हुए कदम बढ़ाने के
लिये इतने कारण पर्याप्त नहीं हैं?


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