परिवर्तन की उद्यमशीलता
किसी विद्वान की उक्ति के अनुसारः ‘‘है
परिवर्तन शील जगत में, शाश्वत केवल परिवर्तन।’’ ऐसे अनेक विचार हम पहले से ही जानते हैं। परन्तु,
क्या
उद्योग जगत वास्तव में शील है? क्या वह शीलता हम महसूस कर पा रहे हैं?
मैनेजमेंट
के दिग्गजों ने तो उद्योग जगत को पहले ही “वूका” (VUCA)
घोषित कर दिया है;
जहाँ वह घमासान है जिसमें अवसर अचानक लुप्त हो रहे हैं; अनिश्चितता का राज है;
जटिलतायें
बढ़ रही हैं; एवं चारों ओर धुंध है। पर शायद सुरंग के छोर पर
रोशनी भी
है; यही हम सबका यकीन है। साथ ही, आगे का मार्ग आगे बढ़ने पर ही दिखेगा; यह भी आज की एक
और हकीकत
है।
कृपया ध्यान दें, हो सकता है,
स्वच्छता
को लेकर हुए हमारी सोच के परिवर्तन कोई ऐसी बात भी छुपी हो जो सबके लिये उपयोगी साबित हो। इस
घटनाक्रम में नागरिकों की सोच स्वच्छता के अलावा दूसरे मुद्दों पर भी बदलती दिखाई
देती है। ऐसा लगता है जैसे इस सकारात्मक परिवर्तन ने दूसरे सकारात्मक परिवर्तनों
को रास्ता खोल दिया हो। स्वच्छता के इस यज्ञ में, कर्मचारियों का
सहयोग व त्याग; साधनों की उपलब्धिता के अलावा कम्यूनिकेशन ने
एक बड़ी भूमिका अदा की है। दीवालों पर लिखे सन्देशों के साथ-साथ कचरा
गाड़ियों पर बजने वाले गीतों ने उन विचारों को जन-जन के मानस पटल पर अंकित कर दिया है। अचेतन में
पैठ कर चुके ये विचार उनके परिवर्तित व्यवहार में प्रदर्शित हो रहे हैं। हम सभी इस
विशाल परिवर्तन
के सहभागी होने के साथ इससे लाभान्वित भी हैं।
तो क्या यह ठीक न होगा कि हमारे उद्योगों के कर्ताप्रमुख परिवर्तन की उद्यमशीलता के एक कदम स्वरूप अपने उद्योगों के आन्तरिक संवाद को बदल कर उसके असर का लाभ उठायें! इस प्रक्रिया में आन्तरिक संवाद की अन्य युक्तियों के अलावा फोकस ग्रुप्स, क्वालिटी सर्कल्स या फिर टाउन हाॅल जैसी युक्ति से उभरी सामुहिक गतिविधियाँ विशेष रूप से उपयोगी साबित होंगी।


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