Friday, November 16, 2018

उद्योग चर्चा - 03 - समय - सहयोग - सफलता

तीन शब्द, समय, सहयोग और सफलता, जड़ के स्तर पर आपस में जुड़े हैं - बाहर से देखने पर ये जुड़ाव नज़र नहीं आता मगर सफलता तक पहुँचने पर इस जुड़ाव को महसूस किया जा सकता है। सही समय पर सहयोग मिल जाय तो सफलता आसान हो जाती है। सही समय की पहचान के लिये समय के साथ दोस्ती का रिश्ता कायम करना आवश्यक है।

प्रत्येक सभ्यता के प्रचलित ज्ञान में समय के महत्व के दर्शन होते हैं। हमारे देश के अग्रणी शासकों में से एक, राजा भोज की नगरी धार में पहाड़ी पर स्थित मंदिर में लगभग 18 इंच की पीतल से बनी एक तोप आज भी रखी है। मंदिर में तोप का क्या काम? फिर इतनी छोटी तोप से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है? पूछने पर मालूम हुआ कि इस तोप से हर प्रहर समय सूचक गोले दागे जाते थे; और तोप का नाम है, लक्ष्मी-तोप! मानों समय लक्ष्मी का प्रतीक है और उसके गुज़रने की सूचना देकर नागरिकों को समय के इस्तेमाल में जिम्मेदार बनाने की व्यवस्था का अंग थी वह तोप। वैसे तो साधारणतया सभी उद्यमी समय के मूल्य को अच्छे से जानते हैं और उनमें से जो स्वयं के समय के साथ-साथ दूसरों के समय की भी उतनी ही कदर करते है, देखा गया है कि वैसे उद्यमी अपेक्षाकृत ज्यादा सफल रहते हैं।

सहयोग भाव तो सर्वकालिक महत्वपूर्ण भाव रहा है। आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक वैल्थ आॅफ नेशन्स में उद्योगों की जानकारी के लिये किये एक अध्ययन को वर्णित किया है। एक ‘आलपिन’ का उत्पादन करने वाली इकाई में किये इस अध्ययन के जरिये उन्होंने श्रम के विभाजन को उत्पादकता के लिये आवश्यक सिध्द किया। पहले उस इकाई का प्रत्येक मजदूर पूरी-की-पूरी आलपिन स्वयं बना कर पैकिंग के लिये देता था। उसके बाद हर एक मजदूर को उस उत्पादन प्रक्रिया का छोटा सा भाग संपादित करना होता। दूसरी तरह से वह इकाई बहुत अधिक आलपिनों का उत्पादन कर सकी। उनके इस प्रयोग से कुछ शताब्दि पूर्व जब हमारा देश  विश्वव्यापार में अग्रणी था तब यहाँ का कपड़ा उद्योग अपनी महानता के लिये विश्वविख्यात था। आपने भी ढ़ाका की मलमल जैसी अनेक किवदन्तियाँ सुन रखी होंगी। अब अगर एक साड़ी बिना दिक्कत किसी अँगूठी में से निकल सके तो उस प्रकार का उत्पादन क्या कोई एक मनुष्य अपने आप अकेले ही कर सकता होगा? अवश्य ही कोई उत्कृष्ट व्यवस्था कई मनुष्यों और समूहों के सहयोग के फलस्वरूप ऐसे उत्पादन को अंजाम तक पहुँचा पाती होगी। उस व्यवस्था अथवा संघ के उद्देश्य किसने निर्धारित किये होंगे? क्या कोई एक व्यक्ति ऐसा करने में समर्थ हो सकता है; या फिर कई लोगों के प्रयासों और उन प्रयासों के फलों का अध्ययन करने पर ऐसा हो सका होगा।

क्या उस प्रकार का सहयोग भाव आज के व्यापारिक तथा औद्योगिक संघों के लिये उपयोगी होगा? क्या उद्योगों के आन्तरिक सहयोग समूहों की तर्ज पर उद्योगों के बीच सहयोग भाव को किसी ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ तक ले जाने की जरूरत जान पड़ती है? यदि वैसा है तो उस ‘‘नेक्स्ट लेवल’’ का ‘‘एजेण्डा’’ क्या हो? और यदि भारतीय उद्योगों को दुनिया ‘‘विश्व की फैक्ट्री’’ के रूप में देख सके तो वे उद्योग कैसे हों, यह प्रश्न आपके विचारार्थ प्रस्तुत है!

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home