उद्योग चर्चा - 05 कार्यकुशलता
कार्यकुशलता के किस्से असंख्य हैं - जितने प्रशंसक उतनी कहानियाँ। प्रशंसा से प्रेरित आँखे उन पात्रों और उनके किस्सों को पहचान ही लेती हैं। अपने उद्योग में कार्यकुशलता की पहचान करना उद्यमियों को आता है, फिर भी इससे सम्बन्धित बातें आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं।
कारीगर और कार्यकुशलता का अटूट नाता है। ऐसे अपुष्ट किस्से भी सुनने को मिलते हैं जिनके अनुसार किसी स्मारक विशेष के बन जाने के बाद अमुक राजा ने कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे। ताकि वैसा स्मारक दोबारा न बन सके। किन्तु उससे क्या मूर्तिकला रूक गयी, नहीं! दरअसल कार्यकुशलता किसी प्रचार साधन की मोहताज नहीं होती। वह तो कुशलताके साधकों की प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर देती है; और अचंभित करने वाले नतीजे तैयार कर देती है। ऐसी ही पाँच पीढ़ियों की एक सत्यकथा आपकी जानकारी के लिये दी जा रही है।
एक गुजराती भाई बम्बई की कपड़ा मिल में रूई की पहचान व छंटाई में कार्यकुशल थे। इस बात की बदौलत वे एक नाॅलेज-वर्कर थे। उनके बेटे को वैसे ही गुण मिले और उन्होंने घड़ी की मरम्मत का काम सीखा और अपने हुनर से अहमदाबाद के प्रमुख घड़ीसाज कस्तूरेजी को भी चकित कर दिया। उसके बाद इन्दौर आने पर अपनी कार्यकुशलता के दम पर वाचरिपेयरिंग की दुकान चलाकर सफल जीवन यापन किया। तीसरी पीढ़ी के सज्जन ने घड़ी के पुरजों की दुकान चला कर जीवन को सफल किया। चौथी पीढ़ी में इन सज्जन के तीन बेटों में से दो जहाँ मशीनी पुरजों के व्यवसाय में अलग-अलग कार्यरत हैं तो तीसरे दवाओं के व्यवसाय में हैं। इस पीढ़ी में आज भरपूर सम्पन्नता दिखाई पड़ती है। पाँचवीं पीढ़ी तैयार हो रही है। कुछ बच्चे आईआईटी जैसी शिक्षा प्राप्त कर उत्कृष्ट जाॅब में हैं तो अन्य उसी तरह से शिक्षा ले रहे हैं। इस परिवार के पितृ पुरूष ने कपड़ा मिल के श्रमिकों के साथ काम करते हुए कार्यकुशलता का पाठ सीख कर अनायास ही आने वाली पीढ़ियों की सम्पन्नता की नींव डाल दी।
भारत के परंपरागत फूडप्रोसेसिंग के उद्योगों के कुशल कार्यकर्ता आज सभी प्रमुख शहरों में पहुँच कर मूल नाम के उत्पादों को वहीं बना कर सप्लाय कर रहे हैं। आन्ध्र प्रदेश से तमिलनाडु गये रूई के खेतिहर मजदूरों ने तिरूपुर में कपड़ा उद्योगों की स्थापना कर निर्यात के कीर्तिमान स्थापित किये हैं। निश्चय ही ऐसी सफलता की कहानियों के नायकों को अपने मूल उद्योग स्थल पर प्रशंसा मिली होगी और उनकी कार्यकुशलता को पहचाना गया होगा। इसके साथ ही उनकी कार्यकुशलता से प्राप्त उत्पादकता का भरपूर लाभ उनके मूल उद्योगों को अवश्य ही मिला होगा।
कारीगर और कार्यकुशलता का अटूट नाता है। ऐसे अपुष्ट किस्से भी सुनने को मिलते हैं जिनके अनुसार किसी स्मारक विशेष के बन जाने के बाद अमुक राजा ने कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे। ताकि वैसा स्मारक दोबारा न बन सके। किन्तु उससे क्या मूर्तिकला रूक गयी, नहीं! दरअसल कार्यकुशलता किसी प्रचार साधन की मोहताज नहीं होती। वह तो कुशलताके साधकों की प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर देती है; और अचंभित करने वाले नतीजे तैयार कर देती है। ऐसी ही पाँच पीढ़ियों की एक सत्यकथा आपकी जानकारी के लिये दी जा रही है।
एक गुजराती भाई बम्बई की कपड़ा मिल में रूई की पहचान व छंटाई में कार्यकुशल थे। इस बात की बदौलत वे एक नाॅलेज-वर्कर थे। उनके बेटे को वैसे ही गुण मिले और उन्होंने घड़ी की मरम्मत का काम सीखा और अपने हुनर से अहमदाबाद के प्रमुख घड़ीसाज कस्तूरेजी को भी चकित कर दिया। उसके बाद इन्दौर आने पर अपनी कार्यकुशलता के दम पर वाचरिपेयरिंग की दुकान चलाकर सफल जीवन यापन किया। तीसरी पीढ़ी के सज्जन ने घड़ी के पुरजों की दुकान चला कर जीवन को सफल किया। चौथी पीढ़ी में इन सज्जन के तीन बेटों में से दो जहाँ मशीनी पुरजों के व्यवसाय में अलग-अलग कार्यरत हैं तो तीसरे दवाओं के व्यवसाय में हैं। इस पीढ़ी में आज भरपूर सम्पन्नता दिखाई पड़ती है। पाँचवीं पीढ़ी तैयार हो रही है। कुछ बच्चे आईआईटी जैसी शिक्षा प्राप्त कर उत्कृष्ट जाॅब में हैं तो अन्य उसी तरह से शिक्षा ले रहे हैं। इस परिवार के पितृ पुरूष ने कपड़ा मिल के श्रमिकों के साथ काम करते हुए कार्यकुशलता का पाठ सीख कर अनायास ही आने वाली पीढ़ियों की सम्पन्नता की नींव डाल दी।
भारत के परंपरागत फूडप्रोसेसिंग के उद्योगों के कुशल कार्यकर्ता आज सभी प्रमुख शहरों में पहुँच कर मूल नाम के उत्पादों को वहीं बना कर सप्लाय कर रहे हैं। आन्ध्र प्रदेश से तमिलनाडु गये रूई के खेतिहर मजदूरों ने तिरूपुर में कपड़ा उद्योगों की स्थापना कर निर्यात के कीर्तिमान स्थापित किये हैं। निश्चय ही ऐसी सफलता की कहानियों के नायकों को अपने मूल उद्योग स्थल पर प्रशंसा मिली होगी और उनकी कार्यकुशलता को पहचाना गया होगा। इसके साथ ही उनकी कार्यकुशलता से प्राप्त उत्पादकता का भरपूर लाभ उनके मूल उद्योगों को अवश्य ही मिला होगा।


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